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Monday, June 29, 2009

ध से धनुष.........ध से धर्म









कहता है धमधूसर लाल,
मेरे पास आओ तुम,
गुड्डी व गुड़िया को भी,
मेरे पास लाओ तुम,
मेरे पास हैं कुछ खिलौने,
वे लेकर जाओ तुम,
खेलो और खेलाओ सबको,
सबका मन बहलाओ तुम।

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से धनुष से धर्म,
धर्म यानि सच्चा कर्म,
सदा सत्य को अपनाना,
छल, कपट को दूर भगाना,
सबके सेवा का लिए व्रत,
कर्तव्य मार्ग पर बढ़ जाना।
कभी ना करना बुरा कर्म,
सदा करना तुम सत्कर्म,
सभी धर्मों का है यह मर्म,
सबसे बड़ा है मानव धर्म।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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Saturday, June 27, 2009

द से दवात...........द से दही









कहता है, प्यारे बच्चों,
तुम्हें विलोम सिखाता हूँ,
शब्दों के बीच उल्टेपन को,
अपनी भाषा में समझाता हूँ।
बड़ा का विलोम होता छोटा,
और पतले का विलोम है मोटा,
दिन का रात, सुबह का साम,
व सम्मान का विलोम है अपमान।
आने का जाना, हँसने का रोना,
लेने का देना व जगने का सोना,
मीठे का तीता, हलके का भारी,
भरे का खाली व नर का नारी।
सीधे का विलोम उल्टा आए,
और धीरे का तेज हो जाए,
विलोम वह तत्त्व कहलाए,
जो दो शब्दों के उल्टे गुण को दर्शाए।
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१.
से दवात, से दही,
दवात में है स्याही भरी,
दही खाओ व लिखते जाओ,
पढ़-लिखकर नाम कमाओ।

२.
दही खाओ, बलवान बनो,
पढ़ो-लिखो व महान बनो,
सदा दूसरों की सेवा करना,
आपस में कभी न लड़ना,
चोरी तुम कभी न करना,
कड़वी बात कभी न कहना,
माँ भारती के सच्चे सेवक,
व देश के कर्णधार बनो,
देश सेवा का व्रत लिए,
तुम शिवा व प्रताप बनो,
लक्ष्मी बनो या बनो दुर्गा,
कृष्ण बनो या राम बनो,
शांति फैले सारे जग में,
ऐसा तुम इंसान बनो,
ऐसा तुम महान बनो।।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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Saturday, June 20, 2009

थ से थाली........थ से थन









कहता है, प्यारे बच्चों,
कुछ काम की बात बताऊँ,
अक्षर, शब्द के बारे में,
मैं आज तुम्हें पढ़ाऊँ।
अक्षर से मिलकर बनते शब्द,
शब्दों से वाक्य बन जाता,
इन वाक्यों के प्रयोग से,
कोई अपनी बात कह जाता।
कोई लिखता
कविता,
कोई कहानी लिख जाता,
इन शब्दों की महिमा से ही,
कोई बड़ा लेखक बन जाता।
तुम भी शब्दों का रखो ज्ञान,
पढ़ो-लिखो और बनो महान,
पढ़ना-लिखना है सुखदाई,
इसी से मिलती सभी बढ़ाई।।
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१.
से थाली, प्यारी-प्यारी,
इसमें खिचड़ी, कितनी सारी,
सीता खिचड़ी खा रही है,
गीता को भी खिला रही है।
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२.
से थन, गैया का थन,
दूध निकले जब हो दोहन,
दूध पीकर हम बने बलवान,
गाय हमारी माँ समान।

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-प्रभाकर पाण्डेय
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त से तकली.........त से तराजू









कहता है, प्यारे बच्चों,
तुम बनो सबके दुलारे,
अच्छे काम करते जाना,
मेहनत से पढ़ते जाना।
सूर्य जैसा तुम चमकोगे,
गुलाब जैसा तुम महकोगे,
प्यार करे तुम्हें दुनिया सारी,
तुम्हारी सूरत लगे सबको प्यारी।।
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१.
से तकली, से तराजू,
तराजू से वह तौल रहा काजू,
तकली से सूत काता जाता,
तराजू तौलने के काम आता।

२.

से तकली, नाच रही है,
देखो सूत वह कात रही है,
जैसे-जैसे नाचते जाती,
वैसे-वैसे सूत कातते जाती।
माँ उस सूत को लपेटा करती,
और उसका गुच्छा बनाती,
इस सूत से जनेऊ भी बनते,
जिसे हम कुछ लोग पहनते।।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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चित्र साभार
webdunia.com
shabdavali.blogspot.com
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कहता है, प्यारे बच्चों,
मैं अपनी बात बताता हूँ,
अपना प्रयोग अब घटता देख,
मैं बहुत सकुचाता हूँ।
पर मुझे बहुत खुशी होती,
शब्दों के बीच में आकर,
अपने मित्र-संबंधियों का,
थोड़ा संसर्ग भी पाकर।
वाण, रण जैसे शब्द,
जो संस्कृत में आए हैं,
बिना किसी बदलाव के,
वे मेरा साथ निभाए हैं।
पर मेरी दुरुहता को,
कुछ हिंदी भाषी पचा न पाए हैं,
इसलिए रन, बान जैसे शब्द भी,
अत्यधिक प्रयोग में आए हैं।।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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ढ से ढक्कन......ढ से ढोल









कहता है ढम-ढम-ढम,
देखो, खरगोश ढोल बजाए,
हिरण, गदहे, बंदर के संग,
छोटू हाथी भी गीत गाए,
सिंहराजा बनकर दूल्हा,
मन ही मन मुस्कुराएँ,
वनवासी सब बने बराती,
हुड़दंग मचाते जाएँ,
उधर सिंहनी के घर,
सब विवाह के गीत गाएँ,
सिंहनी भी दुल्हन बनकर,
आज बहुत इठलाए।
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से ढक्कन, से ढोल,
देखो गीदड़ की खुल गई पोल,
लाल रंग में वह नहाकर आया,
अपने को ईश्वर दूत बताया,
जंगल पर अपना अधिकार जताया,
खुद को सबका राजा बतलाया,
तभी जोर से बादल आया,
झम-झम-झम पानी बरसाया,
गीदड़ कुछ समझ न पाया,
बहुत जोर से अब वह भागा,
उसकी अब खुल गई थी पोल,
से ढक्कन, से ढोल
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-प्रभाकर पाण्डेय
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Friday, June 19, 2009

ड से डमरू......ड ,से डलिया








कहता है डुग-डुग-डुग,
प्यारे बच्चों मेरी बात सुनो,
मन लगाकर करो पढ़ाई,
पढ़-लिखकर होशियार बनो।
अंधेरे का नामोनिशान मिटे,
तुम ऐसा प्रकाश बनो,
करके अच्छे-अच्छे काम,
गाँधी जैसा तुम महान बनो।
भारत माँ के सच्चे सेवक,
और सच्चे तुम लाल बनो,
देश सेवा का व्रत लिए तुम,
लक्ष्मी, शिवा व प्रताप बनो।।
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१.
से डमरू, बाजे डम-डम,
देखो बंदर नाचे छम-छम,
बंदर के संग एक बंदरिया,
ओढ़ी है वह लाल चुनरिया,
बंदर को वह मुँह चिढ़ाए,
बात-बात पर काटे धाए,
पर बंदर सदा हँसता जाए,
और बार-बार उसे मनाए।।
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२.
से डमरू, से डलिया,
डलिया एक लिए है रजिया,
फूलों को वह तोड़ती जाए,
व डलिया में रखती जाए,
इन फूलों की बनेगी माला,
जिसे पहनेगा डमरूवाला,
वह डम-डम डमरू बजाएगा,
खेल-तमाशे दिख लाएगा,
बंदर-बंदरिया को नचाएगा,
बच्चों का मन बहलाएगा।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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Friday, December 12, 2008

वह भारत देश हमारा है।

वह भारत देश हमारा है,
सब देशों से न्यारा है।
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
जहाँ प्रेम से रहते,
प्रेम, मानवता, भाईचारा,
जहाँ हैं फलते-फूलते।
वह भारत देश हमारा है,

सब देशों से न्यारा है।
जहाँ खेत में रामू काका,
सुबह कलेवा करते,
रात होते ही चुन्नू-मुन्नू,
दादी की लोरी सुनते,
वह भारत देश हमारा है,
सब देशों से न्यारा है।
नेताजी, भगत, आजाद जहाँ,
हर बच्चे द्वारा गाए जाते,
रामायण, गीता, कुरान जहाँ,
घर-घर में पाए जाते,
वह भारत देश हमारा है,
सब देशों से न्यारा है।
जहाँ बड़ों की सेवा करना,
सब अपना धर्म समझते,
जहाँ देश पर मर-मिटना,
लोग अपना भाग्य समझते,
वह भारत देश हमारा है,
सब देशों से न्यारा है।।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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चित्र- साभार- http://www।rrindia.com/
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Sunday, December 7, 2008

ठ से ठठेरा, ठग से ठग





कहता है प्यारे बच्चों,
हमें कुछ कर दिखाना है,
भेदभाव, घृणा को भगाकर,
प्रेम, भाईचारा बढ़ाना है,
करके अच्छे-अच्छे काम,
देश में सुख-समृद्धि लाना है,
सबसे प्यारा, देश हमारा,
संदेश, घर-घर में पहुँचाना है।









१.
से ठठेरा, हमें पढ़ना है,
काम यह अभी करना है,
आओ ठठेरे से मिलाऊँ,
उसके बारे में बताऊँ,
ठठेरा बरतन है बनाता,
मेहनत की रोती है खाता,
गाँव-शहर में घूम-घूमकर,
अपना काम वह करते जाता,
सबको बाबू, भइया कहता,
सादगी से है वह रहता,
मन लगाकर करे अपना काम,
काम के बदले पाए उचित दाम,
उससे सीख तुम भी ले लो भाई,
ईमानदार बनो, ठग नहीं, मेरे भाई।।
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२.
ठग वह इंसान कहलाए,
जो सबको ठगता जाए,
अपना उल्लू सीधा करे,
और दूसरों को उल्लू बनाए,
अगर कभी पकड़ में आ जाए,
उसकी नानी याद आ जाए,
सबलोग उसकी करें बुराई,
ठगना अच्छा काम नहीं भाई।।
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प्रभाकर पाण्डेय
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Tuesday, October 14, 2008

ट से टमाटर...ट से टट्टू





कहता है, टन, टन, टन,
कौवा घंटी बजा रहा है,
कबूतर, कोयल, मैना के संघ,
मुर्गा भी स्कूल जा रहा है।
आज चील अध्यापकजी,
गणित के सवाल बताएँगे,
और कठफोड़वा गुरुजी भी,
हमें एकता का पाठ पढ़ाएँगे।
हम मन लगाकर करें पढ़ाई,
जीवन होगा सदा सुखदाई,
सब करेंगे अपना गुणगान,
हम होंगे अपने देश की शान।
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टमाटर



से टमाटर, से टट्टू,
सुन लो प्यारे, गोलू, पप्पू,
राधा, रानी तुम भी सुन लो,
जल्दी-जल्दी तुम भी पढ़ लो,
पढ़ना-लिखना है सुखदाई,
इसी से मिलती सभी बढ़ाई।।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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टट्टू

Thursday, July 10, 2008





कहता है प्यारे बच्चों,
सुन लो ध्यान से मेरी बातें,
ङ, ञ, ण हैं, हिंदी के ऐसे वर्ण,
जो किसी शब्द में पहले नहीं आते,
पर शब्दों में बने रहकर,
ये अपना भान सदा कराते।
अधिक बार ये आधा ही आते,
और अपनी जगह बिंदी दे जाते,
जैसे- चंचल, गंगा, ठंडा,
मंगल, मंजु व बनारसी पंडा,
पर ये अपने रूप में भी आते,
चञ्चल, ठण्डा जैसा भी लिखे जाते।
तुम सदा ध्यान से करो पढ़ाई,
जीवन होगा सदा सुखदायी।

-प्रभाकर पाण्डेय

Sunday, June 8, 2008

झ -- झंडा





कहता है, झम-झम-झम,
देखो बरस रहा है पानी,
भीग रहे हैं पेड़ व पौधे,
भीग रहा नदी का पानी,
भीग रहे हैं खेत-खलिहान,
भीग रहे मेरे नाना-नानी।
चलो कागज की नाव बनाएँ,
वर्षा-जल में इसे तैराएँ,
बारिश का आनन्द उठाएँ,
बचपन अपना सफल बनाएँ।।
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बच्चों, से होता है झंडा,
जो लहर-लहर लहराता है,
भारत का झंडा है तिरंगा,
जो भारत की शान बढ़ाता है।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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Saturday, June 7, 2008

ज -- जहाज





कहता है, जय हिंद बोलो,
बोलो, भारत माँ की जय,
जय बोलो भगत, आजाद की,
नेताजी व गाँधीजी की जय,
जय बोलो, शास्त्री, पटेल की,
१५ अगस्त, २६ जनवरी की जय,
जय बोलो तुम शिवा, प्रताप की,
बोलो, माँ भारती की जय,
जय हो सदा भारत वीरों की,
जय हो, हो जय, जय, जय
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से जहाज, पढ़ लो आज,
कल , झरने की बारी है,
बनना है अगर ज्ञानवान तो,
पढ़ना रखना जारी है।
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प्रभाकर पाण्डेय
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छ -- छाता






कहता है छमछम-छमछम,
देखो नाच रहा है भालू,
बंदर डमरू डमका रहा है,
मेढक भी डोल बजा रहा है,
गा रहा है गदहा गाना,
हेंको-हेंको, ता-ना-ना-ना।
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से छाता, से छड़ी,
छाते में होती कई कड़ी,
गोल-गोल होता है छाता,
धूप,बारिश से हमें बचाता,
हर व्यक्ति को है यह भाता,
ले लो मुन्नू तुम भी छाता।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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Friday, June 6, 2008

च -- चरखा






कहता है चाँद बनो तुम,
चाँद जैसे काम करो तुम,
जब सूरज डूब जाता है,
अंधकार फैल जाता है,
तब चाँद जाता है,
रोशनी कर जाता है।
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से चरखा होता है,
इससे सूत बनता है,
गाँधीजी इसे चलाते थे,
स्वदेशी की बात बताते थे।
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चरखे से बना सूत,
सूत से बना कपड़ा,
कपड़े से बनी टोपी,
जिसे पहने है गोपी।
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प्रभाकर पाण्डेय
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कहता है प्यारे बच्चों,
करो तुम कुछ ऐसा काम,
सब पढ़े-लिखें , बनें होशियार,
सबको हो सबसे प्यार,
कोई किसी का दिल न दुखाए,
घर-घर में सुख-शांति आए।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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घ -- घर





कहता है, प्यारे बच्चों,
ज्ञान का दीप जलाओ तुम,
अज्ञान को धरा से भगाओ तुम,
प्रेम और भाईचारे का संदेश,
घर-घर में पहुँचाओ तुम।
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से होता है घर,
जिसमें प्रेम से रहें हम,
सबके दुख-दर्द में हाथ बटाएँ,
घर को हम स्वर्ग बनाएँ।
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से होता है घर,
जिसमें प्रेम से रहते हम,
बड़े जनों का प्यार हैं पाते,
छोटों को स्नेह दे जाते,
अच्छे बच्चे हम कहलाते।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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ग -- गदहा






कहता है, प्यारे बच्चों,
गुण सीखो तुम अच्छे-अच्छे,
बड़ों की आज्ञा पालन करना,
सबसे हिलमिलकर रहना,
झूठ तुम कभी न कहना,
समय पर हर काम करना,
कम खाना व समय पर खाना,
सही समय पर पढ़ने जाना,
इससे तुम बहु सुख पाओगे,
जीवन में आगे बढ़ जाओगे,
सबके प्यारे बन जाओगे।










से गदहा होता है,
बोझ वह ढोता है,
हेंको-हेंको करता है,
लड़ने से वह डरता है।
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जो सीधी-साधी बात भी,
जल्दी समझ पाता है,
छोटे-छोटे काम में भी,
घंटों समय लगाता है,
प्यारे बच्चों, वह व्यक्ति भी,
बड़ा गदहा कहलाता है।
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-प्रभाकर पाण्डेय
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Friday, April 18, 2008

ख -- खरगोश





कहता है, समय पर खाओ,
हँसते-गाते स्कूल तुम जाओ,
मन लगाकर करो पढ़ाई,
जीवन होगा सदा सुखदाई।
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कहता है, मेरे पहले,
जानते क्यों आता है,
खाना खाने से पहले,
काम की बात बताता है,
कर्मशील बनो, आलस्य को त्यागो,
कर्त्तव्य-मार्ग पर बढ़ जाओ,
करके अच्छे-अच्छे काम,
सबके प्यारे बन जाओ।
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से होता है खरगोश,
छोटा-छोटा, प्यारा-प्यारा,
हरी-हरी घासों को खाता,
हरी घास पर मौज मनाता,
अंग्रेजी में रैबिट कहलाता,
बच्चों का वह मन बहलाता।

-प्रभाकर पाण्डेय
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Thursday, April 17, 2008

कछुआ हारा, खरगोश जीता

प्यारे बच्चों! आज मैं तुम्हें कछुआ और खरगोश की एक नई कहानी सुनाता हूँ। इस कहानी में दौड़ में कछुआ नहीं बल्कि खरगोश ने मारी बाजी। वह कैसे? तो सुनो :-
नदी के किनारे के जंगल में एक कछुआ और एक खरगोश साथ-साथ रहते थे। वे साथ-साथ नदी में डुबकी लगाते और एक साथ बैठकर पढ़ाई भी करते।
एक दिन कछुए ने खरगोश से
कहा, "तुम्हें याद है; एकबार मेरे दादा ने तुम्हारे दादा को दौड़ में हराया था?" खरगोश ने कहा, "ये भी कोई भूलनेवाली बात है, मित्र। ऐसी ही घटनाओं से हम जीवन में बहुत सारी अच्छी बातें सीख जाते हैं।" कछुए ने कहा, "क्या तुम मेरे साथ दौड़ लगाओगे?" खरगोश ने हामी भर दी।
दूसरे दिन नियत समय पर एक कौवे की देख-रेख में दौड़-प्रतियोगिता शुरु हुई। कछुआ
अपनी धीमी गति से चला जबकि खरगोश तेज दौड़ा और तबतक दौड़ता रहा जबतक दौड़-प्रतियोगिता में निर्धारित मंजिल तक नहीं पहुँचा। कछुआ धीरे-धीरे पर लगातार चलता रहा और जब मंजिल पर पहुँचा तो क्या देखता है कि खरगोश तो मंजिल पर पहुँचकर आराम फरमा रहा है। कछुए ने कहा, "मित्र खरगोश! इसबार तुम जीत गए लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई।" "कौन-सी बात मित्र", खरगोश ने पूछा। कछुए ने कहा, "तुम अपने दादा की तरह बीच में पेड़ की छाँव में आराम क्यों नहीं किए?" खरगोश हँसा और बोला, "मित्र! मेरे दादा हमेशा मुझसे कहते रहते हैं कि 'आराम हराम है'; गाँधीजी ने भी गाया है कि 'जो सोवत है सो खोवत है' और आज का युग भी पहले जैसा नहीं रहा। आज के युग में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए तत्परता, निरंतरता के साथ ही साथ शीघ्रता भी अति आवश्यक है। इसलिए मैंने मंजिल पर पहुँचकर ही आराम करना उचित समझा।"
प्यारे बच्चों! क्या आप हमें बताओगे कि इस कहानी से आपने क्या सीखा?
-प्रभाकर पाण्डेय
'

Thursday, March 20, 2008

क --- कमल








कहता है, काम करो तुम,
मत घुमो, खूब पढ़ो तुम,
पढ़ना-लिखना है सुखदाई,
इसी से मिलती सभी बढ़ाई।










से कमल का फूल,
जो है हमारा राष्ट्रीय फूल,
यह जल में खिलता है,
कितना अच्छा लगता है।
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क, का, कि, की,
चल दूध पी,
कु, कू, के, कौ,
बोल भारत की जै,
को, कौ, कं, कः,
घर में हिलमिलकर रह।


-प्रभाकर पाण्डेय
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